
दिव्य आत्मा
कुछ लोग बाते करते थे
सुना है, कोई देवदूत
जनकल्याणके खातिर कभी
इस जगमें अवतार लेते है
क्या आपने इन्हें कहीं भी
सचमुच होते हुए देखा है?
तब किसीने हंसकर कहा
ओ मेरे नादान बंधु सुनो
कौन इस जगमें सिर्फ
निष्काम नीति लिये
हरदम निरंतर निशदिन
हमारे लिये ही कार्यरत है
निज आस रहित जीव
अपने निर्लेप दकतरसाब
वोही तो दिव्य आत्मा है
उन्हें शतसहस्त्र प्रणाम हो
यह रचना दाकतर समुदायको समर्पित है l ईश्वर उन्हें दीर्घायु करें l
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