क्यों है परेशान ओ बंधु

 

माना की मानव सहज स्वभाव है

प्रत्येक जन - मनमें मनोवेग होना

जिसका गहरा प्रभाव और प्रतीति

जीवनमें हरख-शोकके रूप दिखाये

 

ना जाने कौन कब किसका लिखा

नियति नियम है यहां आनाजाना

और जगतमें किसके लिये कितने

धूप-छांवके चढाव-उतारसे गुज़रना

 

ना पता कौन किसे क्या स्वरूपमें

संयोगसे मिल जाये पर एक दिन

अचानक देखे नियत था बिछडना

जो निमित्त है होनी लाचार सहेना

 

हम कई सपने तो चावसे बुनते है

जिसे साकार करने बेहद जूझते है

पर सिर्फ भाग्यवान सफल होते है

 बाकीके भाग टूटी आस-आह दिखे 

 

फिर भी समझदार यह समझ पाये

निज घात पीडा ईश इच्छा सज़ासे

कोई कुछ भी करें पर बच न पाये

सो चुपके से करम-धर्म राहपे चले

 

न जाने कोई कैसी अजब ये पहेली

समय आते विधाता खोले जो होय

अपनी किस्मत कडी वो अटल रहे

जो कभी सुखद या रूखी-रूठी लगे

 

ऎसे वक्त एक ओर कटु सच दिखे

इस जगमें शायद ही किसीको हो

अपने खुशी-गमकी ज़रा भी चिंता

सो निज दैव स्थिति नहि जताना

 

पर विश्वास करो कोई भी समाँ हो

चाहो ना चहो कायम नहि ठहरता

और जब नियत अवधि समाप्त हो

तब एकाएक जीवनको बदल डाले

 

विधाताका जोड-तोड चक्र ये खेल

हमें चकमा देकर सतानेकी मज़ा

लेने ही शायद बनाया गया होगा

सो स्थिर रहेनेकी कोशिश जरूरी

 

Music now Playing "Autumns started now"

Composed & Played by John Torp

http://www.johntorpmusic.se/

Used with Permission

Background by John Torp

 

 

Page Views

Free Counter
Free Counter
.